Follow by Email

Thursday, 12 December 2013

मतदाता का स्वार्थ, किन्तु अब बड़ी त्रासदी-

लालच में जन-गण फंसे, बिजली पानी मुफ्त |
इत पंजे से त्रस्त मन, उत मंसूबे गुप्त |

उत मंसूबे गुप्त, इकट्ठा तीस फीसदी |
मतदाता का स्वार्थ, किन्तु अब बड़ी त्रासदी |

दिल्ली बिन सरकार, यही हर दिन की कच-पच | 
वायदे तो भरपूर, पूर कर रविकर लालच |

(1)
कारें चलती देश में, भर डीजल-ईमान |
अट्ठाइस गण साथ पर, नहिं व्यवहारिक ज्ञान |

नहिं व्यवहारिक ज्ञान, मन्त्र ना तंत्र तार्किक |
*स्नेहक पुर्जे बीच, नहीं ^शीतांबु हार्दिक |
*लुब्रिकेंट  ^ कूलेंट 

गया पाय लाइसेंस, एक पंजे के मारे |
तो स्टीयरिंग थाम, चला दिखला सर-कारें ||

7 comments:

  1. जल्दी से कोई रास्ता निकल आये और सरकार मिले दिल्ली को...

    ReplyDelete
  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (14-12-2013) "नीड़ का पंथ दिखाएँ" : चर्चा मंच : चर्चा अंक : 1461 पर होगी.
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है.
    सादर...!

    ReplyDelete
  3. (1)
    कारें चलती देश में, भर डीजल-ईमान |
    अट्ठाइस गण साथ पर, नहिं व्यवहारिक ज्ञान |

    नहिं व्यवहारिक ज्ञान, मन्त्र ना तंत्र तार्किक |
    *स्नेहक पुर्जे बीच, नहीं ^शीतांबु हार्दिक |
    *लुब्रिकेंट ^ कूलेंट

    गया पाय लाइसेंस, एक पंजे के मारे |
    तो स्टीयरिंग थाम, चला दिखला सर-कारें ||

    भाई साहब कमाल है शब्द चातुर्य और संदर्भित प्रयोग का .

    ReplyDelete
  4. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज शनिवार (14-12-13) को "वो एक नाम" (चर्चा मंच : अंक-1461) पर भी है!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    ReplyDelete