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Monday, 2 September 2013

गुरु हो अर्जुन सरिस, अन्यथा बन जा छक्का-

(1)
छक्का पंजा भूलता, जाएँ छक्के छूट |
छंद-मन्त्र छलछंद जब, कूट-कर्म से लूट |

कूट-कर्म से लूट, दुष्ट का फूटे भंडा |
पाये डंडा दण्ड, बदन हो जाये कंडा |

रविकर घटे प्रताप, कीर्ति को लगता धक्का |
गुरु हो अर्जुन सरिस, अन्यथा बन जा छक्का ||

(2)
गलती का पुतला मनुज, दनुज सरिस नहिं क्रूर |
मापदण्ड दुहरे मगर, व्यवहारिक भरपूर |

व्यवहारिक भरपूर, मुखौटे पर चालाकी |
रविकर मद में चूर, चाल चल जाय बला की |

करे स्वार्थ सब सिद्ध, उमरिया जस तस ढलती |
करता अब फ़रियाद, दाल लेकिन नहिं गलती ||

6 comments:

  1. रविकर घटे प्रताप, कीर्ति को लगता धक्का |
    गुरु अर्जुन सादृश्य, अन्यथा बन जा छक्का ||


    क्या बात है .. :)

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  2. बहुत अच्छा लिखते हैं।जितनी तारीफ़ की जाय कम ।

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  3. एक से बढ़कर एक !

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