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Tuesday, 16 October 2012

घट जावें इ'स्पर्म, बिगाड़े सेहत चड्ढी ।-



जिम्मेदारी के तले, ऐसे गए दबाय ।
बेसुध की यह बेखुदी, कर ना पाई हाय ।
कर ना पाई हाय, गधे सा खटता रहता ।
उनको रहा सराह, उन्हीं की गाथा कहता ।
खुद को ले पहचान, होय खुद का आभारी ।
कर खुद की तारीफ़,  उठा ले जिम्मेदारी ।।


यायावर की यह कथा, मन के बड़े समीप ।
प्रेम लुटाते जा रहे, कर प्रज्वलित प्रदीप । 
कर प्रज्वलित प्रदीप, अश्व यह अश्वमेध सा ।
बाँध सके ना कोय, ठहरना है निषेध सा ।
सिखा गए संगीत,  गए सन्मार्ग दिखाकर ।
 सादर करूँ प्रणाम, सफ़र कर 'वे' यायावर ।।


चड्ढी बिन खेला किया, आठ साल तक बाल ।
शीतल मंद समीर से, अंग-अंग खुशहाल ।
अंग-अंग खुशहाल, जांघिया फिर जो पा ली।
हुवे अधिक जब तंग, लंगोटी ढीली ढाली |  
चड्ढी का खटराग, बैठ ना पावे खुड्डी ।
घट जावें इ'स्पर्म, बिगाड़े सेहत चड्ढी ।।


सारे जैसा सोचते, तू वैसा ही सोच ।
बकरी को कुत्ता कहें,
मत कुत्ता को कोंच ।
मत
कुत्ता को कोंच, लोच जीवन में आया ।
लुच्चों ने ही आज, सदन में नाम कमाया । 

हरिश्चंद के पूत, घूमते मारे मारे ।

करो वही सब काम, करें जो चालू सारे ।।

गस्त कबीरा मारता, अक्खड़ ढूंढे खूब ।
कोठे पर पाया पड़ा, रहा सुरा में डूब ।
रहा सुरा में डूब, चरण-चुम्बन कर चहके ।
अपनों को अपशब्द, गालियाँ देकर बहके ।
यह अक्खड़पन व्यर्थ, स्वार्थी सोच शरीरा।
फँसा झूठ में जाय, तोड़ के भाग कबीरा ।।



कौवा मोती खा रहा, दाना तो है खीज ।
वंचित वंचित ही रहे, ताकत की तदबीज ।

ताकत की तदबीज, चतुर सप्लाई सिस्टम ।

कौआ धूर्त दलाल, झपट ले सब कुछ हरदम ।

काँव-काँव माहौल, खड़ा कर देता हौवा ।

  है अपनी सरकार, नोंच कर भागे कौवा ।।  

1 comment:

  1. सुन्दर प्रस्तुति!
    काँव-काँ का ही संसार है!

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