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Friday, 12 October 2012

खींच सकी नहिं कान, तभी नख-शिख तड़पाया-




 अन्तरिक्ष नगर 
मन्त्र-शक्ति से था बसा, पहले त्रिपुर-स्थान ।
लटक गए त्रिशंकु भी,  इंद्र रहे रिसियान ।
इंद्र रहे रिसियान, हुए क्रोधित त्रिपुरारी ।
मय दानव का मान, मिटाई कृतियाँ सारी ।
बसते नगर महान, आज फिर तंत्र-शक्ति से ।
पहले का संसार, सधा था मन्त्र-शक्ति से ।।


चांदी कूटे रात दिन, बन माया का दास |
  धर्म कर्म विज्ञान का, उड़ा रहा उपहास |
उड़ा रहा उपहास, धरे निर्मल-शुभ चोला |
अंतर लालच-पाप, ठगे वो रविकर भोला |  
  करे ढोंग पाखण्ड, हुई मानवता माँदी |
मिलना निश्चित दंड, काटले कुछ दिन चांदी ||

 दिल 
मुश्किल सह अस्तित्व था, दुराग्रही पहचान ।
खतरे में खुद पड़ चुका, बालक जिद्दी जान ।
  बालक जिद्दी जान, जान अब मेरी खाए ।
करूँ नहीं एहसान, आज फिर कौन बचाए ।
है निरीह शैतान, सदा हमने बहलाया ।
खींच सकी नहिं कान,  तभी नख-शिख तड़पाया ।।

पत्नी सम्पत्ति नहीं है  
काली-गोरी साँवली, सब का अपना तेज ।
पर दम्भी शैतान दुष्ट, करता नहिं परहेज।
राखे नहीं सहेज, प्रेम को करे वासना ।
पति समझे सम्पत्ति, छोड़ता नहीं त्रासना ।
प्रेमी पति का प्रेम, लगे है गन्दी गाली ।
चेत जरा शैतान, नहीं तो प्रगटे काली ।।


भैया चित्र सटीक है, है भौजी मनमार |
दर्दे दिल की दें दवा, प्यार भरा उपहार |
प्यार भरा उपहार, पीर तो अरुण-किरण है |
फैले अब उजियार, मूरती करे वरण है |
तरिहे गौतम नार, जमा मिष्ठान खवैया |
रविकर भी है साथ, देखता भौजी भैया ||



माओ-वाद 
लाना चाहो मार्क्स तो, पढ़ना मार्क्स विचार ।
बम-बम से करते घृणा, हरदम बम से प्यार ।
हरदम बम से प्यार, जुल्म की हदें पार की ।
मिटे पुराने केंद्र,  बधाई बंग हार की ।
चले अंध सरकार, चीन से जड़ें मिटाना ।
तिब्बत का दे साथ, ख़ुशी दुनिया में लाना ।

3 comments:

  1. वाह...
    बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (14-10-2012) के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    सूचनार्थ!

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  2. चांदी कूटे रात दिन, बन माया का दास |
    धर्म कर्म विज्ञान का, उड़ा रहा उपहास |
    उड़ा रहा उपहास, धरे निर्मल-शुभ चोला |
    अंतर लालच-पाप, ठगे वो रविकर भोला |

    करे ढोंग पाखण्ड, हुई मानवता माँदी |

    मिलना निश्चित दंड, काटले कुछ दिन चांदी ||


    चांदी कूटे रात दिन, बन माया का दास |
    धर्म कर्म विज्ञान का, उड़ा रहा उपहास |
    उड़ा रहा उपहास, धरे निर्मल-शुभ चोला |
    अंतर लालच-पाप, ठगे वो रविकर भोला |

    करे ढोंग पाखण्ड, हुई मानवता माँदी |

    मिलना निश्चित दंड, काटले कुछ दिन चांदी ||

    बहुत खूब सूरत तंज़ व्यवस्था गत भ्रष्टाचार पर .

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  3. कुंडलियाँ सटीक हैं, चित्र कहाँ से लाय?

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