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Friday, 5 October 2012

चौदह चश्मे चक्षु पर, चतुर चोर बैमान-




दृष्टिकोण
दृष्टि-दोष से त्रस्त है, मानव अभिनव-ज्ञान ।
चौदह चश्मे चक्षु पर, चतुर चोर बैमान । 
चतुर चोर बैमान, स्वार्थी क्रूर *द्विरेतस ।
बाल तरुण नर-नारि, सत्य भी देखे टस-मस ।
दृष्टिकोण हर बार, बदलना गर्व घोष है ।
करे स्वयं पर वार, बावला दृष्टि-दोष है ।।
*खच्चर 

चलते रहो  
होते जब अनुकूल सब, सरपट दौड़ लगाय ।
 सम्मुख हो प्रतिकूलता, धीरे धीरे जाय । 
 धीरे धीरे जाय , धर्म अपना न छोड़े । 
बढ़िया वेला पाय, ठहरते सदा भगोड़े । 
तेरा हूँ पाबन्द, काल अन्तिम में सोते । 
समय पाय ना ठहर, जहाँ में मेरे होते --

दोराहे 
दो राहे पर चाँदनी, चकित थकित सा सोम ।
  सूर्य धरा के फेर से, कैसे निपटूं व्योम ??
कैसे निपटूं व्योम, धरा का टुकड़ा प्यारा ।
रहा अनवरत घूम, सूर्य का मिला सहारा ।
रविकर का एहसान, जगत सारा जो चाहे ।
बड़ा धरा का मान, खड़ा था जो दोराहे ।।

आई ना अलसाय, आईना क्यूँकर तोड़े
दिल के जोड़े से कहाँ, कृपण करेज जुड़ाय ।
सौ फीसद हो मामला, जाकर तभी अघाय । 
जाकर तभी अघाय, सीखना जारी रखिये ।
दर्दो-गम आनन्द, मस्त तैयारी रखिये ।
आई ना अलसाय, आईना क्यूँकर तोड़े ।
आएगी तड़पाय, बनेंगे दिल के जोड़े ।।


मरे न गन से ड्रैगन
 चीनी ड्रैगन लीलता, त्रिविष्टप संसार ।
दैव-शक्ति को पड़ेगा, पाना इससे पार ।
पाना इससे पार, मरे न गन से ड्रैगन ।
देखेगा गरनाल, तभी यह काँपे गन-गन ।
भरा पूर्ण घट-पाप,  दूंढ़ जग चाल महीनी ।
होय तभी यह  साफ़, बड़ी कडुवी यह चीनी ।।

होली  
मुद्राएँ या भंगिमा, चंचल चित्त प्रदर्श ।
उत्तेजित क्रोधित बदन, चाहे होवे हर्ष ।
चाहे होवे हर्ष, वर्ष भर भरे कुलांचें  ।
तनिक हुआ आकर्ष, रोज वो सिर पर नाचें ।
रविकर साला का' न्ट , आप तो खुब होलियाये  ।
खुशियाँ सबको बाँट,  रही मुद्रा मुद्राएँ ।। 

पहला प्यार
 सारे दुःख की जड़ यही, रखें याद संजोय |
समय घाव न भर सका, आँखे रहें भिगोय ।
आँखे रहें भिगोय, नहीं मांगें छुटकारा  ।
सीमा में चुपचाप, मौन ही नाम पुकारा ।
रविकर पहला प्यार, हमेशा हृदय पुकारे ।
दिख जाये इक बार, मिटें दुःख मेरे सारे ।।


  मैया मथुरा माय, मरे मेहरा मेहरारू
दारु यात्रा पुत्र की, माता सहती पीर ।
काशी में ही त्यागना,  चाहे व्यर्थ शरीर ।
  चाहे व्यर्थ शरीर, काम न किसी काज का ।
बढे दवा का खर्च,  दिखे दुश्मन अनाज का ।
मैया मथुरा माय, मरे मेहरा मेहरारू ।
देता माँ को छोड़, सनक सुत *साला दारू।।

4 comments:

  1. इतना सब कैसे कर लेते हो?
    .
    .
    .अद्भुत सृजन !

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  2. कविता आप जैसे लोगों की बजह से जीवित है


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  3. जीवंत अदभुत कुंडलियाँ....

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  4. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (07-10-2012) के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    सूचनार्थ!

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