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Thursday, 25 October 2012

पगली है तो क्या हुआ, मांस देख कामांध-




 पगली है तो क्या हुआ, मांस देख कामांध ।
 अपने तीर बुलाय के, तीर साधता सान्ध |
तीर साधता सान्ध, बांधता जंजीरों से |
घायल तन मन प्राण, करे जालिम तीरों से |
गर्भवती हो जाय, ढूँढ़ता कुत्ता अगली |
दुष्ट मस्त निर्द्वन्द, बिगाड़ेगी क्या पगली


 संसाधन सा जानिये, संयुत कुल परिवार |
गाढ़े में ठाढ़े मिलें, बिना लिए आभार |
बिना लिए आभार, कृपा की करते वृष्टी |
दादा दादी देव, दुआ दे दुर्लभ दृष्टी |
सच्चे रिश्ते मुफ्त, हमेशा भला इरादा |
रखे सकल परिवार, सदा अक्षुण मर्यादा |

 परिभाषित जीवन किया,  दृष्टिकोण में दर्द ।
प्रेम तमन्ना कर्म पर,  मजबूरी का गर्द ।
मजबूरी का गर्द , हुआ जीवन पर हावी ।
बंधी सांस की डोर, खींचता जीवन भावी ।
 हुए अकेले राम,  फिरें भटकें वन-वासित ।
मजबूरी का दंश, करे जीवन परिभाषित ।।

  दिल तो लल्लू है सखे, सगी हैं दोनों आँख |
चले फिसलता हर घरी, बुद्धि सिखाये लाख |

बुद्धि सिखाये लाख, फफोले दिल के फोड़े |
बाहर करे गुबार, किन्तु ना उनको छोड़े |

रविकर कर विश्वास, हुआ है बड़ा निठल्लू |
पल्लू की ले आस, घुमाता दिल तो लल्लू ||


गमला पौधा सुमन खुश, शुभ आँगन अन्यान्य |
संतानों के सृजन से, माँ का जीवन धन्य |
माँ का जीवन धन्य, असंभव माँ विश्लेषण |
 दुग्ध रक्त तन दान, प्रेम-भावों का प्रेषण |

बहुत बहुत आभार,  नारियों पुरुष-पुरौधा |
 हे ममतामय नारि, खिला मन-गमला-पौधा ||

2 comments:

  1. सादर अभिवादन!
    --
    बहुत अच्छी प्रस्तुति!
    इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (27-10-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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