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Monday, 15 October 2012

रेत नदी की है रखे, पुरखों के पद चिन्ह-




खिलें बगीचे में सदा, भान्ति भान्ति के रंग ।
पुष्प-पत्र-फल मंजरी, तितली भ्रमर पतंग ।
तितली भ्रमर पतंग, बागवाँ नयारे न्यारे ।
दुनिया होती दंग,  आय के सम्मुख द्वारे ।
नित्य पौध नव रोप,  हाथ से हरदिन सींचे ।
कठिन परिश्रम होय, मिलें तब खिले बगीचे ।


फूलों पर उल्लू उड़े, उगले ऊल-जुलूल ।
रविकर इंग्लिश फूल को, जाता फिर से भूल ।

जाता फिर से भूल, बड़े झाड़ों में उलझा ।

जिनका बना उसूल, वहीँ पर जाते मुरझा ।

पर भाई उल्लूक, सितम अब उनके भूलो ।

अवसर यह मत चूक, फलो दिन में भी फूलो ।।  

पुस्तक आत्मौषधि सही,  सुनो 'थीब्स' का पक्ष  ।
बिन पुस्तक का घर लगे, बिन खिड़की का कक्ष ।
बिन खिड़की का कक्ष, पुस्तकें चखते 'बेकन' ।
निगल जाय कुछ मस्त, पचाते उत्तम लेकिन ।
 पढ़िए बढ़े 'मनोज', खरीदें खुद से भरसक ।
'प्रेमचंद' की बात, समझिये पढ़िए पुस्तक ।। 


अलीगढ़ी ताला लगे, चाहे चुनो दिवार ।
रविकर के परवेश हित, काफी  एक दरार ।
काफी एक दरार, लगा खिड़की दरवाजा ।
काले परदे साज, सुनेगा गाना बाजा ।
माना है रविवार, मगर ना करो बवाला ।
हम है पक्के यार, तोड़कर आयें ताला ।।

 रेत नदी की है रखे, पुरखों के पद चिन्ह ।
नव-चिन्हों से वे मगर, लगते इकदम भिन्न ।

लगते इकदम भिन्न, यहाँ श्रद्धा ना दीखे ।
खुदगर्जी संलिप्त, युवा मस्ती में चीखे ।
उनको नहीं मलाल, समस्या इसी सदी की ।
पर्यावरण बिगाड़, बिगाड़े रेत नदी की ।।

1 comment:

  1. बेहद संजीदा और मन को झकझोर दें ऐसे भाव ,आभार |

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