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Wednesday, 10 October 2012

सुख-शान्ति सौहार्द, ग़मों ने गप-गप गटका -




 हिस्सेदारी
चोट्टे चौगोषा लखें, चमचे चुप चुबलांय ।
चौगोषा मिष्ठान भर, चाट-चूट  के खांय ।

चाट-चूट
के खांय, हरेरी सबके छावे ।
अफसरगन उकताँय, जान जोखिम में पावे।

फिफ्टी-फिफ्टी होय, चलाचल चक दे फ़ट्टे ।

व्यर्थ हुवे बदनाम,  आज मौसेरे चोट्टे ।।

इच्छा  
इच्छा कर ले नियंत्रित, मत जाना तू लेट ।
चूहों को देते अभय, उल्लू लेत लपेट । 

उल्लू लेत लपेट, आज-कल कम्बल ओढ़े ।

घी से भरते पेट, समझ न गलत निगोड़े ।

मिलते उल्लू ढेर, सोच की करो समीक्षा ।

अंधे हाथ बटेर, नहीं तो करती इच्छा ।। 

जीवन  
इंजन की यह साम्यता, जीवन की इंजील ।
कोलाहल अनुनाद की, सुनती देह अपील ।
सुनती देह अपील, तेज चलने की सोचे ।
घर्षण बाढ़े कील, ढील हो लगे खरोंचे ।
गति रहती सामान्य, बजे सरगम मन-रंजन ।
करते यही प्रवीण, सुनों जो कहता इंजन ।।

गम  
झटका खाए गम-गलत, हर्ष करे संघर्ष ।
हुई विषादी देहली, हो कैसे उत्कर्ष । 
हो कैसे उत्कर्ष, अरुण क्यूँ  मारे चक्कर ।
मेघों का आतंक, तड़ित की जालिम टक्कर ।
सुख-शान्ति सौहार्द, ग़मों ने गप-गप गटका ।
टूट-फूट मन-कन्च, पञ्च तत्वों को झटका ।

पूर्वाग्राही
 कुविचारी के शब्द भी, बदल-बदल दें अर्थ ।
पूर्वाग्राही है अगर, समझाना है व्यर्थ ।
समझाना है व्यर्थ, बना सौदागर बेंचे ।
सुविधा-भोगी दुष्ट, स्वयं ना रेखा खैंचे ।
चोरी के ले शब्द, तोड़ मर्यादा सारी ।
द्वंदर अपरस गिद्ध, बड़ा भारी कुविचारी ।।

1 comment:

  1. सार्थक कुण्डलियाँ!
    सुन्दर प्रस्तुति....! शुभसंध्या!

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