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Friday, 13 September 2013

मुखड़ा है निस्तेज, नारियां लगती माँदी-

टकी टकटकी थी लगी, जन्म *बेटकी होय |
अटकी-भटकी साँस से, रह रह कर वह रोय |

रह रह कर वह रोय, निहारे अम्मा दादी |
मुखड़ा है निस्तेज, नारियां लगती माँदी |

परम्परा प्रतिकूल, बेटकी रविकर खटकी |
किस्मत से बच जाय, कंस तो निश्चय पटकी ||
.
*बेटी

6 comments:

  1. बहुत ही सुन्दर रचना ,अकल क्यों हो गई तुम्हारी मंदा
    बेटी नहीं है गले का फंदा
    अकल के अपने ताले खोलो
    जय जय जय बेटी बोलो

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टी का लिंक कल शनिवार (14-09-2013) को "यशोदा मैया है मेरी हिँदी" (चर्चा मंचः अंक-1368)... पर भी होगा!
    हिन्दी दिवस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...!
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. संवेदनशील ... पूर्ण रूप से समाज कभी जागेगा भी ...

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