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Thursday, 26 September 2013

अगर शत्रु के नाम, बड़े आरोप लगाए -

कुटनी के करतूत से, कूटनीति नाकाम |
चालू है अब धूर्तता, पाई शक्ति तमाम |

पाई शक्ति तमाम, छूट अपराधी पाए |
अगर शत्रु के नाम, बड़े आरोप लगाए |

हेर फेर अज मेर, शेर की इज्जत लुटनी |
चूक हुई इस बार, फँसा देगी पर कुटनी ||

3 comments:

  1. हा हा फंस चुके :)

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टी का लिंक आज शनिवार (28-09-2013) को ""इस दिल में तुम्हारी यादें.." (चर्चा मंचःअंक-1382)
    पर भी होगा!
    हिन्दी पखवाड़े की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...!
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. बहुत खूब रविकर जी .जूते खाके नित हँसते .

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