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Monday, 3 September 2012

लगी दांव पर साख, शाख पर उल्लू बैठे -

बैठे रहते थे पकड़, उल्लू जो जो शाख।
चीर-चार के ठोक के, करके कई सुराख ।

करके कई सुराख, कुर्सियां वह बनवाया ।
फेविकोल का घोल, बड़ा गाढ़ा लगवाया ।

पावर का है खेल, सकल प्यादे भी ऐंठे ।
लगी दांव पर साख, शाख पर उल्लू बैठे ।।




7 comments:

  1. पावर का है खेल, सकल प्यादे भी ऐंठे
    लगी दांव पर साख, शाख पर उल्लू बैठे ..

    अब तो ये उल्लू चिपक भी गए हैं ... उखड़ने वाले नहीं लगते ..

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  2. गजब !

    मैं तो कहीं नहीं गया
    यह आप कैसे कह बैठे !

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  3. जी हाँ,
    शाख दाँव पर लगी है मगर शाख बची ही कहाँ है?

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  4. नख्ले जां को ख़ूं पिलाया उम्र भर
    शाख़े हस्ती आज भी जाने क्यूं ज़र्द है

    हिंदी ब्लॉगिंग की मुख्यधारा को संवारने के लिए मस्त सुझाव.


    शुक्रिया।

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