दाने दाने को दिखा, कोयलांचल मुहताज ।
दान दून दे दनादन, दमके दिल्ली राज ।
दमके दिल्ली राज, घुटे ही करें घुटाला ।
बाशिंदों पर गाज, किसी ने नहीं सँभाला ।
नक्सल भी नाराज, विषैला धुवाँ मुहाने ।
धधके अंतर आग, लुटाते लंठ खदाने ।।

अंगारों पर ही बसा, है झरिया अधिकाँश |
भू-धसान हरदिन घटे, जलता जिन्दा मांस |
जलता जिन्दा मांस, जलाने वालों सुन लो |
इक बढ़िया सी मौत, स्वयं से पहले चुन लो |
खड़ी हमारी खाट, करे चालाक मिनिस्टर |
करता बंदरबांट, कटे वासेपुर अन्दर ||
भू-धसान हरदिन घटे, जलता जिन्दा मांस |
जलता जिन्दा मांस, जलाने वालों सुन लो |
इक बढ़िया सी मौत, स्वयं से पहले चुन लो |
खड़ी हमारी खाट, करे चालाक मिनिस्टर |
करता बंदरबांट, कटे वासेपुर अन्दर ||

कौड़ी कौड़ी बेंचते, झारखंड का माल ।
बाशिंदे कंगाल है, पूछे मौत सवाल ।
पूछे मौत सवाल, आज ही क्या आ जाऊं ?
पल पल देते टाल, हाल क्या तुम्हें बताऊँ?
डूब मरे सरकार, घुटाले करके भारी ।
होते हम तैयार, रखो तुम भी तैयारी ।।

अंग नंग अंगा दफ़न, कफन बिना फनकार ।
रंग ढंग बदले सकल, रहा लील अंगार ।
रहा लील अंगार, सार जीवन का पाया ।
होवे न उद्धार, आग जिसने भड़काया ।
रविकर भरसक खाय, लिए मुट्ठी अंगारा ।
राक्षस किन्तु जलाय, कोयला रखे दुबारा ।।
सच कहा आपने यूँ ही सरकारे चली जा रही है ..किस ओर इसका कुछ पता नही ..
ReplyDeleteबहुत खूब!
कहीं की बिजली
ReplyDeleteकहीं का कोयला
दिल्ली खा खा जाये
बिल्ली बन बन
म्याँऊ करो
यही सीख दे जाये !
सच्चाई से कही गयी बात अच्छी लगी.........
ReplyDeleteपल पल देते टाल, हाल क्या तुम्हें बताऊँ?
ReplyDeleteडूब मरे सरकार, घुटाले करके भारी ।
होते हम तैयार, रखो तुम भी तैयारी ।।
कौड़ी कौड़ी बेंचते, झारखंड का माल ।
बाशिंदे कंगाल है, पूछे मौत सवाल ।
पूछे मौत सवाल, आज ही क्या आ जाऊं ?
पल पल देते टाल, हाल क्या तुम्हें बताऊँ?
डूब मरे सरकार, घुटाले करके भारी ।
होते हम तैयार, रखो तुम भी तैयारी ।।
मैया मोरी कसम तोरी ,मैं नाहीं कोयला खायो ,
पक्ष विपक्ष सब बैर पड़ें हैं बरबस मुख पे लगायो ....
मैया मोरी मैं नाहीं कोयला खायो ....
ये बढ़िया रही... :)
ReplyDeleteअच्छा खबर ले ली चोरों की आपने कविता में
बेहतरीन सरस रसमयी सृजन मन को उद्वेलित करते हुए ...... प्रशंसनीय ....बधाईयाँ जी,
ReplyDeleteसमसामायिक रचना...आभार!
ReplyDeleteअंग नंग संग भुजंग, का फन बिना फुफकार
ReplyDeleteबहुत जोरदार, सामयिक और सटीक ।
ReplyDelete