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Saturday, 22 September 2012

नाड़ू अपनी जेब भर रहे, मोहन करते दान -

इक्यान्नबे में बाबू जी की बिगड़ी नई दुकान ।
पाँच भाइयों के चक्कर में, हुआ बड़ा नुक्सान ।

चीनी मैदा तेल कोयला, बेसन घी मजदूरी ।
नाड़ू अपनी जेब भर रहे, मोहन करते दान ।

भट्ठी का कोयला ख़तम, दूरभाष पर बातें -
ख़तम नहीं राजा भैया की, भाभी भी हैरान ।

नौकर चाकर रहे चुराते, अपना हिस्सा खूब-
बूढी मैया मामा के घर, बन जाती मेहमान ।

आखिर डूबी नई दुकनिया, नौ सालों का धोखा 
बाबू जी को पड़ा बेचना, अपना बड़ा मकान ।।


2 comments:

  1. बहुत सुन्दर और सटीक..

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  2. स्थिति गंभीर से गंभीरतम होती जा रही है।

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