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Friday, 28 September 2012

भूले सही उसूल, गलत अनुसरण कराते-

 झूठ-सांच की आग में, झुलसे अंतर रोज |
किन्तु हकीकत न सके, नादाँ अब तक खोज |

नादाँ अब तक खोज, बड़े वादे दावे थे |
राष्ट्र-भक्ति के गीत, सुरों में खुब गावे थे |


दृष्टि-दोष दम फूल, झूल रस्ते में जाते |
भूले सही उसूल, गलत अनुसरण कराते ||

4 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (30-09-2012) के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    सूचनार्थ!

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  2. झूठ-सांच की आग में, झुलसे अंतर रोज |
    किन्तु हकीकत न सके, नादाँ अब तक खोज |

    क्या बात है. बहुत खूब.

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