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Sunday, 9 September 2012

मधुमक्खी और मच्छर की बहस -रविकर

Makkhi
 गेंडुरी-1
मधुमक्खी उवाच  
मधुमक्खी ने यूँ कहा, सुनिए मच्छर राज ।
करूँ इकट्ठा नित शहद, आये सब के काज ।  
आये सब के काज, भलाई सबकी करती ।
लाती सुख सामृद्धि, परिस्थिति विकट संवरती ।
लेकिन मच्छर राज, सदा तू खून पी रहा।
मलेरिया संक्रमण,  ज्वर डेंगू अक्सरहां ।।

Mosquito in Action


गेंडुरी-2
मच्छर उवाच  
मच्छर यूँ कहने लगा, मानुष बड़ा निकृष्ट ।
बैठ डाल को काटता, मिटा रहा है सृष्ट ।
मिटा रहा है सृष्ट, मिटा दूंगा मैं इसको ।
फण-धारी से माँग, करूँगा तीखा विष को ।
करता मच्छर क्रोध, अरी रे निर्बल मक्खी ।
तू तो है असहाय, इकट्ठा मधु जो रक्खी ।।

 गेंडुरी-3
मधुमक्खी उवाच  
मैं भी लेकर घूमती, तुझसे तीखे डंक ।
जो छेड़े न छोड़ती, हो राजा या रंक ।
हो राजा या रंक,  नहीं काटूँ बेमतलब ।
रहते सब नि:शंक, नहीं रोगी हों या रब ।
मधुमक्खी मधु घोल, बोल यूँ बोली सुन ले ।
चार दिनों का चक्र, कर्म कुछ अच्छे चुन ले ।।

दोहे
मच्छर उवाच  
ठहर तुझे मैं देखता, री मक्खी निर्लज्ज ।
सौ सौ चूहे खाय के, चली है करने  हज्ज ।1।

पुष्प करोड़ों रौंद के, नित स्वारथ में लीन ।
लेती उसका पक्ष है, जो लेता मधु  छीन ।2।

मानव सबसे स्वार्थी, परपीड़न में दक्ष ।
फैलता खुब गन्दगी, स्वच्छ रखे ना कक्ष ।3।

रहे जहाँ भी जहाँ में, फैलाये दुर्गन्ध ।
कूड़ा कचरा मूत्र गू , मद में पूरा अंध । 4।

चुन चुन कर हत्या करे, काटे पेड़-पहाड़ ।
जीव जंतु कितने ख़तम, भूला सिंह दहाड़ ।5।

शोषण धरती का किया, गगन रहा है भेद ।
सारी धरती जीत कर, सबको रहा खरेद ।6।

कीट नाशकों का करे, प्रतिपल आविष्कार ।
इसीलिए हम कर रहे, विकट विषैला वार ।7।
  गेंडुरी-4
भौंरा उवाच 
बढ़ी रार को देखकर, भौरें ने की बात ।
मक्खी मच्छर से कहे, पहचानो औकात ।
पहचानो औकात, रात दिन के ये झगड़े ।
ये मानव बद्जात, चुटुक से रिश्ते रगड़े ।
तुम दोनों तो गैर, जुल्म अपनों पर ढाए । 
 तुम आखिर क्या चीज, बीज तक कई मिटाए ।


6 comments:

  1. बहुत बढिया।

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  2. वाह रविकर जी....
    लाजवाब...
    चार दिनों का चक्र, कर्म कुछ अच्छे चुन ले ।।
    इंसानों के लिए भी लागू....
    बढ़िया वार्तालाप...

    सादर
    अनु

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  3. मक्खी के शहद इकठ्ठा करने में भी फूलों का तो नुकसान ही है !
    रोचक !

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  4. वाह .. क्या गज़ब वार्तालाप है ...
    जय हो ...

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