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Wednesday, 21 November 2012

जब तक दुनिया है सखे, तब तक पत्थर राज-




 जब तक दुनिया है सखे, तब तक पत्थर राज |
पत्थर  से  टकराय  के,  लौटे   हर  आवाज  ||
लौटे   हर  आवाज,  लिखाये  किस्मत  लोढ़े,
कर्मों पर विश्वास, करे  क्या  किन्तु  निगोड़े ?
कोई  नहीं  हबीब,  मिला जो उसको अबतक,
जिए  पत्थरों  बीच, रहेगा जीवन जब तक ||

 काका हाथरसी 

काकी की चलती रही, काका पर शमशीर |
बेलन से पिटते रहे,  खाई फिर भी खीर |
खाई फिर भी खीर, तीर काकी के आकर|

बने कलम के वीर, धरा पूरी महका  कर | 
पर रविकर इक बात, बता बाँकी की बाकी |
मिली कहाँ से तात, आपको ऐसी काकी ||


घनाक्षरी 
खनन उपक्रम का, बेबस राजधर्म का
लूट-तंत्र बेशर्म का, सुवाद अंगूरी है |
राजपाट पाय-जात, धरती का खोद-खाद
लूट-लूट खूब खात, मिलती मंजूरी है |
कहीं कांगरेस राज, भाजप का वही काज
छोट न आवत  बाज, भेड़-चाल पूरी है |
चट्टे-बट्टे थैली केर, सारे साले एक मेर,
देर नहिं अंधेर है,  आम मजबूरी है || 

4 comments:

  1. जब तक दुनिया है सखे, तब तक पत्थर राज...
    पत्थर राज की सब माने ,न माने गिरेगी गाज!!!
    शुभकामनायें!

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  2. चट्टे-बट्टे थैली केर, सारे साले एक मेर,
    देर नहिं अंधेर है, आम मजबूरी है ||

    सटीक और सामयिक ।

    काका हाथरसी और काकी की याद में कुटली बढिया लगी ।

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  3. वाह वाह क्या बात है .बेशर्मों पे कुठाराघात है, आवत नहीं फिर भी लाज है .कांग्रेसी "बाज़ "हैं .

    घनाक्षरी
    खनन उपक्रम का, बेबस राजधर्म का
    लूट-तंत्र बेशर्म का, सुवाद अंगूरी है |
    राजपाट पाय-जात, धरती का खोद-खाद
    लूट-लूट खूब खात, मिलती मंजूरी है |
    कहीं कांगरेस राज, भाजप का वही काज
    छोट न आवत बाज, भेड़-चाल पूरी है |
    चट्टे-बट्टे थैली केर, सारे साले एक मेर,
    देर नहिं अंधेर है, आम मजबूरी है ||

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