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Monday, 5 November 2012

जिभ्या का व्यायाम हो, हो दमड़ी नहिं खर्च-



 सलाह 
 जिभ्या का व्यायाम हो, हो दमड़ी नहिं खर्च |
समय बिता ले मजे से, करती बुद्धि रिसर्च |
करती बुद्धि रिसर्च, लोग विद्वान समझते |
बढ़ता खुद का दर्प, सँभल कर लोग निकलते |
बाजे थोथा घना, चना करवा दे फांका |
क्रियाशील रस-ग्रंथि, स्वाद बढ़ता जिभ्या का ||

अनुभव  

जाना है तो एक दिन, दनदनाय दिन बीत |
समय सतत गतिमान है, यही जगत की रीत |
यही जगत की रीत, तकाजा जिम्मा बंधन |
अनुभव बढ़ता जाय, सीखता जाता जीवन |
पर आ जाता काल, व्यर्थ हो गया मनाना |
बचुवा इसे संभाल, छोड़ कर चला खजाना ||


 उम्मीदों का जल रहा, देखो सतत चिराग |
घृत डालो नित प्रेम का, बनी रहे लौ-आग |
बनी रहे लौ-आग, दिवाली चलो मना ले |
अपना अपना दीप, स्वयं अंतस में बालें |
भाई चारा बढे, भरोसा प्रेम सभी दो |
सुख शान्ति-सौहार्द, बढ़ो हरदम उम्मीदों ||

स्वर्ण अशरफ़ी सा रखो, रिश्ते हृदय संजोय । 
 हृदय-तंतु संवेदना, कहीं जाय ना खोय ।
कहीं जाय ना खोय, गगन में पंख पसारो ।
उड़ उड़ ऊपर जाय, धरा को किन्तु निहारो ।
 रिश्ते सभी निभाय, रहें नहिं केवल हरफ़ी 
 कहीं जाय ना खोय, हमारी स्वर्ण अशरफ़ी ।।

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