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Monday, 5 November 2012

छूछ आग से 'के-जरी', जे 'गुट-करी' जनाब-


कवि-लीडर  
ताली गाली से सदा, इनका सरोकार |
बाता-बाती में नहीं, कोई पाए पार |
कोई पाए पार, मगर लीडर दे टक्कर |
लफ्फाजी व्यापार, काम इक करता हटकर |
खोज माल असबाब, खजाना करता खाली |
लेकिन कवि की जात, खोज नहिं पाता ताली ||


शादी  
चाहें दोनों तरफ ही, मार रही थी जोर |
बन्दा बड़ा उजड्ड पर, ये बन्दी मुंहचोर |
ये बन्दी मुंहचोर, बनाई है अब बन्दी |
नाच नचाये जोर, देख चुपचाप बुलंदी |
लड्डू लीन्हा खाय, दांत का दर्द कराहे |
वही डाक्टर तोर, मिटाए जो वो चाहे ||

 2014 - का चुनाव
छूछ आग से 'के-जरी', जे 'गुट-करी' जनाब |
'सोनी-या' रोनी शकल, करती काम खराब |
करती काम खराब, बड़ा डेंगू है फैला |
सुबह कपाली काँख, फाँक ले सूखा मैला |
मत घबराना किन्तु, वोट तो मिलें भाग से |
नाती पुत्र दमाद, डरें नहीं छूछ आग से ||


2 comments:

  1. व्यंग से भरी ...पर सच्ची कुंडलियाँ ...:-))))
    शुभकामनाएँ!

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