पैना पड़ता पीठ पर , लेकिन चमड़ी मोट ।
दमड़ी दमड़ी लुट गई, सहता रहता चोट ।
फोटो खिंचा रहा अनशन में ।
पैनापन तलवार सा, कैंची कतरे कान ।
सुन लो बात वजीर की, होता जो हैरान-
आग लगे उस नश्वर तन में ।।
बा-शिंदे चाहे मरें, कांगरेस परिवार ।
अव्वल रहते रेस में, शत्रु दलों को मार -
यही इण्डिया, रहें वतन में ।।
गडके-करी समेत धन, पता पता नहिं मित्र ।
छापे पड़ने लगे जब, हालत हुई विचित्र -
बदल गया निर्णय फिर क्षण में ।।
बाप-पूत अन्दर गए, शिक्षक आये याद ।
दो दो मिल सोलह करे, शिक्षा हो बरबाद -
हरियाणा में किस्सा जन्में ।।
This comment has been removed by the author.
ReplyDeleteबहुत सुन्दर दोहा गीत!
ReplyDeleteअति सुन्दर !!
ReplyDeleteबहुत ही समसामयिक !
ReplyDeleteबहुत ही उम्दा "हरियां पर चोट मर कर,बाप पूत घुस गए अब अन्दर ,करें जेल में शोर नाचावें बन्दर,....." गड गड गडके गडकरी बोले बहुतई बोल , सारे इसके भेद दिया रविकर ने खोल...." शिंदे तो बडबोला है इसका गन्दा खेल ,बैठ के अब दिल्ली में ,चल रहा है रेल,..."
ReplyDeleteरविकर जी ,आप का नया रूप मन को भाया ,
ReplyDeleteधवल दाड़ी ने चेहरे पे रौब जमाया..:-))
सब है बड बोले ,सबके बोली है गोल गोल
ReplyDeleteसमझ गए सब हम ,रविकर ने खोल दिया पोल .