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Tuesday, 22 January 2013

गडके-करी समेत धन, पता पता नहिं मित्र-

पैना पड़ता पीठ पर , लेकिन चमड़ी मोट ।
दमड़ी दमड़ी लुट गई, सहता रहता चोट ।
फोटो खिंचा रहा अनशन में ।
 

पैनापन तलवार सा, कैंची कतरे कान ।
सुन लो बात वजीर की, होता जो हैरान-
आग लगे उस नश्वर तन में ।।

बा-शिंदे चाहे मरें,  कांगरेस परिवार ।
अव्वल रहते रेस में, शत्रु दलों को मार -
यही इण्डिया, रहें वतन में ।।

गडके-करी समेत धन, पता पता नहिं मित्र ।
छापे पड़ने लगे जब, हालत हुई विचित्र -
बदल गया निर्णय फिर क्षण में ।।

बाप-पूत अन्दर गए, शिक्षक आये याद ।
दो दो मिल सोलह करे, शिक्षा हो बरबाद -
हरियाणा में किस्सा जन्में ।।


7 comments:

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  2. बहुत ही उम्दा "हरियां पर चोट मर कर,बाप पूत घुस गए अब अन्दर ,करें जेल में शोर नाचावें बन्दर,....." गड गड गडके गडकरी बोले बहुतई बोल , सारे इसके भेद दिया रविकर ने खोल...." शिंदे तो बडबोला है इसका गन्दा खेल ,बैठ के अब दिल्ली में ,चल रहा है रेल,..."

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  3. रविकर जी ,आप का नया रूप मन को भाया ,
    धवल दाड़ी ने चेहरे पे रौब जमाया..:-))

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  4. सब है बड बोले ,सबके बोली है गोल गोल
    समझ गए सब हम ,रविकर ने खोल दिया पोल .

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