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Sunday, 13 January 2013

पेशी ओ-वेशी भड़क, बोले न्यायाधीश -



पेशी ओ-वेशी भड़क, बोले न्यायाधीश ।
बके गालियाँ राम को, लेकिन देख खबीस ।

लेकिन देख खबीस, *राम दो दो हैं आये ।
दे दलील वे किन्तु, जमानत हम ठुकराए ।

नियमबद्ध अन्यथा, एक क्षण भी है वेशी ।
करदूं काम-तमाम,  आखिरी होती पेशी ।।

* दोनों वकीलों के नाम में राम 

बाप चुके थे बाट, बाट मत अब ओ बेशी- 

  ओ-वेशी मत बकबका, मुहाजिरों को देख |
सर्वाइव कैसे करें, शिया मियां कुल शेख |
शिया मियां कुल शेख, पाक की हालत बदतर |
इत मुस्लिम खुशहाल, किसी से हैं क्या कमतर ?
विश्लेषण अनुसार, हिन्दु है बड़ा हितैषी  |
बाप चुके थे बाट, बाट मत अब ओ बेशी ||
 

Kulwant Happy 
ओ वेशी मत बकबका, सह ले सह अस्तित्व ।
जीवन की कर बात रे, क्यूँकर घेरे मृत्यु ।
क्यूँकर घेरे मृत्यु , बात कर सौ करोड़ की ।
 लानत सौ सौ बार, बंद कर बन्दर घुड़की ।
कन्वर्टेड इंसान, पूर्वज तेरे देशी ।
कर डी एन ए मैच, बकबका मत ओ वेशी ।।

वेशी ले गुजरा-त-मकु, आ-मोदी तूफ़ान-

 वेशी ले गुजरा-त-मकु, आ-मोदी तूफ़ान ।
 ला-ओ-वेशी ठान के, मिनटों में कल्यान ।
मिनटों में कल्यान, कहे घेरे बीमारी ।
भोगे हिन्दुस्तान,  मरे जनता बेचारी ।
तेरी है सरकार, झूठ की कैसी पेशी ।
है गलबहियां डाल, कहूँ राहुल क्या वेशी ??
तमकु = चिढ़कर 
मकु=कदाचित 
वेशी = अधिक 
 
 

2 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    --
    दाढ़ी के इस वेश में, बहुत जँच रहे आप।

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  2. मकर संक्रान्ति के अवसर पर
    उत्तरायणी की बहुत-बहुत बधाई!

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