Follow by Email

Friday, 18 January 2013

चढ़ा गुलाबी रंग, देख जयपुर *सरमाया-

गज-गति लख *गज्जूह की, हाथी भरे सफ़ेद ।
 बजट परे चिंतन करें, बना गजट में छेद ।

बना गजट में छेद, एक ही फोटो छाया ।
चढ़ा गुलाबी रंग, देख जयपुर *सरमाया । 

रविकर तो शरमाय, पहिर साड़ी यह नौ गज ।
कोने रहे लुकाय, सदी के सारे दिग्गज ।। 


 हुल्लड़ होता है हटकु, *हालाहली हलोर ।
हुई सुमाता खुश बहुत, कब से रही अगोर ।

कब से रही अगोर, हुआ बबलू अब लायक ।
हर्षित दिग्गी-द्रोण, सौंप के सारे ^शायक ।

नीति नियम कुल सीख, करेगा अब ना फाउल ।
सब विधि लायक दीख, आह! दुनिया को राहुल ।।
*दारू ^तीर
 

5 comments:



  1. गज-गति लख *गज्जूह की, हाथी भरे सफ़ेद ।
    बजट परे चिंतन करें, बना गजट में छेद ।

    :)

    हुल्लड़ होता है हटकु, *हालाहली हलोर ।
    हुई सुमाता खुश बहुत, कब से रही अगोर ।

    आपके व्यंग्य बाणों से राहत मिलती है ...
    चलाते रहिए ...

    साधुवाद !

    ReplyDelete
  2. सब विधि लायक दीख, आह! दुनिया को राहुल

    कितना मुश्किल काम है ।

    ReplyDelete
  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    आपकी पोस्ट के लिंक की चर्चा कल रविवार (20-01-2013) के चर्चा मंच-1130 (आप भी रस्मी टिप्पणी करते हैं...!) पर भी होगी!
    सूचनार्थ... सादर!

    ReplyDelete
  4. सुन्दर व्यंग्य(1)बना गजट में छेद, एक ही फोटो छाया ।
    चढ़ा गुलाबी रंग, देख जयपुर *सरमाया ।

    रविकर तो शरमाय, पहिर साड़ी यह नौ गज ।
    कोने रहे लुकाय, सदी के सारे दिग्गज ।।
    (2) कब से रही अगोर, हुआ बबलू अब लायक ।
    हर्षित दिग्गी-द्रोण, सौंप के सारे ^शायक ।

    नीति नियम कुल सीख, करेगा अब ना फाउल ।
    सब विधि लायक दीख, आह! दुनिया को राहुल ।।

    ReplyDelete