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Wednesday, 16 January 2013

व्याकुल वनिता वत्स, महाकामी *वत्सादन





हुआ भयानक हादसा, दिल्ली में वीभत्स
रौद्र-करुण उत्तेजना, व्याकुल वनिता-वत्स ।

व्याकुल वनिता वत्स, महाकामी *वत्सादन ।
अद्भुत सत्ताधीश, शांत-रस का उत्पादन ।

करे हास्य-श्रृंगार  , किन्तु फिर पाक अचानक ।
 काट गया दो शीश, वीर रस हुआ भयानक ।।
*भेड़िया 



 
चखना था श्रृंगार रस, हो जाता वीभत्स ।

कहते गुरुवर यह नहीं, तेरे बस का वत्स ।

तेरे बस का वत्स, बैठ जा मार कुंडली ।

 गली गली में भटक, ढूँढ़ता नाहक अगली ।

आजा रविकर पास, ध्यान नुक्कड़ का रखना ।

 है अंग्रेजी-शॉप, साथ ले आना चखना ।।

5 comments:

  1. भयानक के बाद ही वीरता का संचार होता है!
    --
    बढ़िया छन्द-सार्थक टिप्णियाँ!

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  2. Sir Ji, sabhi panktiyan me nihit bahuaayami sundar bhavo se susajjit prastuti

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  3. प्रभावशाली ,
    जारी रहें।

    शुभकामना !!!

    आर्यावर्त (समृद्ध भारत की आवाज़)
    आर्यावर्त में समाचार और आलेख प्रकाशन के लिए सीधे संपादक को editor.aaryaavart@gmail.com पर मेल करें।

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  4. वाह !!आज पहली बार इतनी सुन्दर कुंडलिया देखा .....आभार

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  5. बहुत सुंदर रचना
    बहुत सुन्दर प्रस्तुति. हार्दिक बधाई.

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