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Sunday, 10 November 2013

रिश्ते में दुर्गन्ध, लाश भी तू ही रख ले-

खले खोखला खल-खलल, खारिज खाली खाम |
बिन खोले ही पढ़ लिया, जो आया पैगाम |

जो आया पैगाम, शराफत रविकर छोड़े  |
नित्य वसूले दाम, बाँह भी रोज मरोड़े |

बदले अब सम्बन्ध, ले चुकी सौ सौ बदले |
रिश्ते में दुर्गन्ध, लाश भी तू ही रख ले ||

6 comments:

  1. शराफ़त का ज़माना रहा ही कहां रवि‍कर जी

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  2. सच है ... शराफत का समय नहीं है अब ...

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  3. रिश्ते में दुर्गन्ध, लाश भी तू ही रख ले ||
    सब व्यथा बयाँ कर दी ... आपने इस एक लाइन में !
    शुभ्कम्नायेंब!

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  4. बदले अब सम्बन्ध, ले चुकी सौ सौ बदले |
    रिश्ते में दुर्गन्ध, लाश भी तू ही रख ले |
    ......बहोत प्रभावशाली !!!!!

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  5. सार्थक अभिव्यक्ति ! आभार रविकर जी। धन्यवाद।

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