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Sunday, 17 November 2013

घात लगाए धूर्त, धराये हिन्दु-मुसलमाँ -

(1)
सतत धमाके में मरे, माँ के सच्चे पूत |
वह रैली देकर गई, पक्के कई सबूत |

पक्के कई सबूत, देश पर दाग बदनुमा |
घात लगाए धूर्त, धराये हिन्दु-मुसलमाँ |

माँ को देते बेंच, पाक से पैसा पाके |
पॉलिटिक्स के पेंच, कराएं सतत धमाके ||

(2)
रहमत लाशों पर नहीं, रहम तलाशो व्यर्थ |
अग्गी करने से बचो, अग्गी करे अनर्थ |

अग्गी करे अनर्थ, अगाड़ी जलती तीली |
जीवन-गाड़ी ख़ाक, आग फिर लाखों लीली |

करता गलती एक, उठाये कुनबा जहमत |
रविकर रोटी सेंक, बोलता जिन्दा रह मत ||

(3)
दिखा अंगूठा दे खुदा,  करता भटकल रोष |
ऊपर उँगली कर तभी, रहा खुदा को कोस |

रहा खुदा को कोस, उसे ही करे इशारा |
मारे कई हजार, कहाँ है स्वर्ग हमारा |

रविकर दिया जवाब, मिला जो जेल अनूठा |
यही तुम्हारा स्वर्ग, चिढ़ा तू दिखा अंगूठा ||  

(4)
गोदी में बैठा रखे, रहें पोषते नित्य |
उंगली डाले नाक में, कर विष्टा से कृत्य |

कर विष्टा से कृत्य, भिगोता रहा लंगोटी |
करता गोटी लाल, काटता लाल चिकोटी |

रविकर खोटी नीति, धमाके झेले मोदी |
यह आतंकी प्रीति, छुरी से काया गोदी || 

अटकल दुश्मन लें लगा, है चुनाव आसन्न |
बुरे दौर से गुजरती, सत्ता बांटे अन्न |

सत्ता बाँटे अन्न, पकड़ते हैं आतंकी |
आये दाउद हाथ, होय फिर सत्ता पक्की |

  हो जाए कल्याण, अभी तक टुंडा-भटकल |
पकड़ेंगे कुछ मगर, लगाते रविकर अटकल ||



होती है लेकिन यहाँ, राँची में क्यूँ खाज-

दंगे के प्रतिफल वहाँ, गिना गए युवराज |
होती है लेकिन यहाँ, राँची में क्यूँ खाज |

राँची में क्यूँ खाज, नक्सली आतंकी हैं |
ये आते नहिं बाज, हजारों जानें ली हैं |

अब सत्ता सरकार, हुवे हैं फिर से नंगे |
पटना गया अबोध, हुवे कब रविकर दंगे ||


हुक्कू हूँ करने लगे, अब तो यहाँ सियार |
कब से जंगल-राज में, सब से शान्त बिहार |

सब से शान्त बिहार, सुरक्षित रहा ठिकाना |
किन्तु लगाया दाग,  दगा दे रहा सयाना |

रहा पटाखे दाग, पिसे घुन पिसता गेहूँ |
सत्ता अब तो जाग, बंद कर यह हुक्कू हूँ -

8 comments:

  1. बहुत ही उत्तम और सटीक प्रस्तुति

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  2. सुंदर कुंडलियां बहुत खूब !

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  3. गोदी में बैठा रखे, रहें पोषते नित्य |
    उंगली डाले नाक में, कर विष्टा से कृत्य |

    कर विष्टा से कृत्य, भिगोता रहा लंगोटी |
    करता गोटी लाल, काटता लाल चिकोटी |

    रविकर खोटी नीति, धमाके झेले मोदी |
    यह आतंकी प्रीति, छुरी से काया गोदी ||

    अटकल दुश्मन लें लगा, है चुनाव आसन्न |
    बुरे दौर से गुजरती, सत्ता बांटे अन्न |

    सत्ता बाँटे अन्न, पकड़ते हैं आतंकी |
    आये दाउद हाथ, होय फिर सत्ता पक्की |

    हो जाए कल्याण, अभी तक टुंडा-भटकल |
    पकड़ेंगे कुछ मगर, लगाते रविकर अटकल ||



    होती है लेकिन यहाँ, राँची में क्यूँ खाज-
    दंगे के प्रतिफल वहाँ, गिना गए युवराज |
    होती है लेकिन यहाँ, राँची में क्यूँ खाज |

    राँची में क्यूँ खाज, नक्सली आतंकी हैं |
    ये आते नहिं बाज, हजारों जानें ली हैं |

    अब सत्ता सरकार, हुवे हैं फिर से नंगे |
    पटना गया अबोध, हुवे कब रविकर दंगे ||


    हुक्कू हूँ करने लगे, अब तो यहाँ सियार |
    कब से जंगल-राज में, सब से शान्त बिहार |

    सब से शान्त बिहार, सुरक्षित रहा ठिकाना |
    किन्तु लगाया दाग, दगा दे रहा सयाना |

    रहा पटाखे दाग, पिसे घुन पिसता गेहूँ |
    सत्ता अब तो जाग, बंद कर यह हुक्कू हूँ -

    सटीक व्यंग्य इंतजामिया पर।

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  4. सभी एक से बढ़कर एक. बधाई.

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  5. सभी कुण्डलिया एक से बढ़कर एक ,भाई जी बहुत बहुत बधाई

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  6. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज सोमवार को (18-11-2013) कार्तिक महीने की आखिरी गुज़ारिश : चर्चामंच 1433 में "मयंक का कोना" पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  7. बहुत सुन्दर कुंडलियाँ.
    नई पोस्ट : मेघ का मौसम झुका है

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  8. वाह ! धारदार लेखन

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