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Monday, 4 November 2013

देह देहरी देहरे, दो, दो दिया जलाय -


देह देहरी देहरे,  दो, दो दिया जलाय ।
कर उजेर मन गर्भ-गृह, कुल अघ-तम दहकाय । 

कुल अघ तम दहकाय , दीप दस घूर नरदहा ।
गली द्वार पिछवाड़ , खेत खलिहान लहलहा ।

देवि लक्षि आगमन, विराजो सदा केहरी ।
सुख समृद्ध सौहार्द, बसे कुल देह देहरी ।। 



किरीट  सवैया ( S I I  X  8 )

झल्कत झालर झंकृत झालर झांझ सुहावन रौ  घर-बाहर ।
  दीप बले बहु बल्ब जले तब आतिशबाजि चलाय भयंकर ।
 दाग रहे खलु भाग रहे विष-कीट पतंग जले घनचक्कर ।
नाच रहे खुश बाल धमाल करे मनु तांडव  हे शिव-शंकर ।।

7 comments:

  1. बहुत सुन्दर...दीपोत्सव की हार्दिक शुभकामनायें!

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज मंगलवार (05-11-2013) भइया तुम्हारी हो लम्बी उमर : चर्चामंच 1420 पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    दीपावली के पंचपर्वों की शृंखला में
    भइया दूज की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. झलकत झंकृत झालर झांझ सुहावन रौ घर-बाहर ।
    दीप बले बहु बल्ब जले तब आतिशबाजि चलाय भयंकर ।
    दाग रहे खलु भाग रहे विष-कीट पतंग जले घनचक्कर ।
    नाच रहे खुश बाल धमाल करे मनु तांडव हे शिव-शंकर ।।

    बहुत सुन्दर ध्वनि सौंदर्य और माधुरी तत्व लिए .

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