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Saturday, 23 November 2013

दिनभर बैठ निकालते, ये नरेश गर बाल-

दिनभर बैठ निकालते, ये नरेश गर बाल |
बनत बाल की खाल से, कम से कम इक नाल |

कम से कम इक नाल, लगा घोड़े को देते |
यू पी दुर्गति-काल, प्रगति पथ पर ले लेते |

व्यापारी पर व्यंग, मिलावट करता जमकर |
रहा चाय को कोस, बैठ बन्दा यह दिनभर ||

2 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज रविवार को (24-11-2013) बुझ ना जाए आशाओं की डिभरी ........चर्चामंच के 1440 अंक में "मयंक का कोना" पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. दिनभर बैठ निकालते, ये नरेश गर बाल |
    बनत बाल की खाल से, कम से कम इक नाल |

    कम से कम इक नाल, लगा घोड़े को देते |
    यू पी दुर्गति-काल, प्रगति पथ पर ले लेते |

    व्यापारी पर व्यंग, मिलावट करता जमकर |
    रहा चाय को कोस, बैठ बन्दा यह दिनभर ||

    (व्यंग्य )

    सुन्दर रचना कही है रविकर भाई ने .

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